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मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध | Human negligence can lead to world war.

मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध | Human negligence can lead to world war.

 
मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध 
 
 
मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध 
 
आज इस लेख में बताएंगे कि मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध 
 
धरती पर से जितने भी जीव हैं उन सारे जीवों  में मनुष्य ही सबसे लापरवाह जीव है। मानव सभ्यता के विकसित एवं विकास के क्रम में मनुष्य अपने स्वार्थ के आधार पर ही काम करता रहा है और आश्चर्य की बात है कि विकास के प्रारम्भ से भी यही बात थी और आज भी यही बात है परंतु मनुष्य को पृथ्वी पर कोई भी गतिविधि करने से पहले यह ध्यान देना चाहिए कि जनजीवन और पर्यावरण पर इनका क्या प्रभाव पड़ेगा काफी लंबे समय से मानव समूह जल संसाधनों का उपयोग करता रहा है परंतु उचित और न्याय संगत प्रक्रिया से पीछे रहा है इस कारण पूरे विश्व में जल का अभाव होने के कारण से विश्व युद्ध की स्थिति बन सकती है। इस लेख में जल से संबंधित समस्याओं को दर्शाया गया जो विशेष ध्यान देने योग्य है 
 
आईये और आगे बढ़े 
 
भारत में अजीब बिडंबना है जो जगह-जगह देखने को मिलती है। कहीं जमीन पानी की प्यासी है तो कहीं भयंकर बाढ़ देखने को मिलता है। एक आंकड़े के अनुसार चार करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है जहां हर साल बाढ़ आने की आशंका बनी रहती है। हर साल औसतन 80 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ की त्रासदी का शिकार हो जाती है। इस प्रकार 37 लाख हेक्टेयर फसल बाढ़ से बर्बाद हो जाती है। समुद्री तूफ़ान भी मनुष्य की लापरवाही से ही आते हैं। पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, जलवायु परिवर्तन से काफी चिंतित है वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों की मात्रा बढ़ने से सूरज की गर्मी धरती की हवा में कैद रह जाती है और लौट कर वापस नहीं जा पाती है। ओजोन की परत जो छतरी की तरह तीव्र पराबैंगनी किरणों को रोकती रही थी वह जगह-जगह से फट रही है क्योंकि उसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसी गैसे खाती जा रही है। 
धरती गर्मा रही है इसलिए अगली सदी में औसतन तापमान बढ़ने से मिट्टी में नमी और वर्षा के अनुपात में बदलाव आएगा गर्माती धरती दुनिया के मीठे पानी के आपूर्ति में बदलाव कर सकती है। धरातल के औसतन तापमान में मामूली बढ़त भी हिम नदी एवं बर्फीली चोटियों को पिघला  सकती है जिससे समुद्र का जल स्तर ऊंचा हो सकता है। इस कारण से समुद्र तट के पास वाले इलाकों को तूफानी लहरों का सामना करना पड़ेगा। समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने से उष्णकटिबंधीय चक्रवात बनते हैं। 
 
लगातार धरती का तापमान बढ़ रहा है तथा साथ ही साथ जल संकट भी बढ़ रहा है इस समस्या के पीछे मनुष्य ही कारण है क्योंकि सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाला मनुष्य ही है। जल संकट के बढ़ने का असर इन विवादों में दिखाई पड़ रहे हैं जो नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर उत्पन्न हो रही है। यह समस्या पूरी दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है।
दुनिया में 13 नदिया और झीलें ऐसी है जो 96 देशो के हिस्से में आती है। कम से कम 214 नदियों के कछार ऐसे है जो कई देशों में स्थित है जैसे की 57 अफ्रीकी देशों में और 48 यूरोपीय देशो में।  
 
यूरोप में चार या इससे अधिक देशों में पानी के बंटवारे को लेकर 175 से अधिक समझौते भी हुए हैं। फिर भी पानी को लेकर मारामारी होती रहती है। खास तौर पर निकट पूर्वी देशों में यह समस्या देखने को मिलती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम इसको शार्ट फॉर्म में  UNEP भी कहते हैं। इसके अधीन जो देश नदी घाटी को आपस में बाट कर शांति भाव से पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें जल संसाधनों के प्रबंधकों के लिए प्राथमिकता के आधार पर सहायता दी जाती है।
 
आठ अफ्रीकी  देश एक नदी ज़ाम्बेज़ी के पानी का मिलजुल कर इस्तेमाल कर रहे हैं और इन्हे UNEP ने आर्थिक  सहायता भी दी है। 
 
यदि दुनिया के लोग पर्यावरण और  प्राकृतिक संसाधनों का ठीक से उपयोग नहीं करेंगे तो पूरी दुनिया के लिए समस्या हो सकती है। क्योंकि प्रदूषण से  ही यह सारी समस्या उत्पन्न होती है और लापरवाही और अनजाने में ही पूरी दुनिया के लोग विश्व युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर लेंगे। 
 
आप सभी पाठको से नम्र निवेदन है कि पर्यावरण की रक्षा हेतु स्वयं को जागरूक करें और दूसरों को भी इस लेख  को शेयर जरूर करें धन्यवाद। 

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